पौरोणिक मान्यताओं के अनुसार हिंदू धर्म में 8 महापुरुषों का वर्णन है जिन्हें अजर-अमर माना जाता है। अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमान जी, विभीषण, कृपाचार्य, भगवान परशुराम और ऋषि मार्कण्डेय अमर बताए गए हैं। भगवन परशुराम का वर्णन रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में पढ़ने को मिलता है। भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि (Jamadagni) के पुत्र थे और उनकी माता रेणुका थी उनकी पाचवी सन्तान परशुराम थे। भगवान परशुराम भगवान विष्णु नारायण के छठे अवतार माने जाते है,लोगो का माना है कि भगवान परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों के कुल हैहय वंश का संहार किया था, लेकिन यह पूरी बात सत्य है।
तो चलिए आज हम आप को भगवान परशुराम के इतिहास और उनकी कथाओं के बारे में जानते है।
भगवान परशुराम का जन्म त्रेतायुग के प्रांरभ में, और सतयुग के अंत में हुआ था, जो की भगवान नारायण के छठे अवतार माने जाते है, पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म इनके पिता द्वारा किये गये पुत्रेष्टि यज्ञ से, देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर यह वरदान दिया था की माता रेणुका, बैसाख महीने के शुक्ल तृतीया को परशुराम को जन्म दिया था।
आखिर क्यों भगवान परशुराम ने माता रेणुका का वध किया था ? आज हम इस कहानी के माधयम से जानेंगे।
परशुराम का जन्म भले ही ब्राह्मण कुल में हुआ था परंतु वे जन्म से ही क्षत्रिय का गुण था, एक समय की बात है, इनके पिता जब यज्ञ व पूजा-पाठ में दुबे हुए थे तो परशुराम की माता जल लेने के लिए नदी पर चली गई थी, जहां पर राजा चित्ररथ स्नान कर रहे थे, माता रेणुका उन्हें देखकर मोहित हो गयी थी, जब यह बात भगवन परशुराम के पिता जमदग्नि ने अपने तप के बल से अपनी पत्नी का कर्म का पता चला था। तो उन्होंने अपने पांचो पुत्रो को अपनी ही माता रेणुका का वध करने का आदेश दिया था, लेकिन दया की वजह से चार पुत्रो ने अपनी माता का वध नहीं किया। तो फिर भगवान परशुराम को आदेश दिया की अपनी वज्र से अपनी माता और भाइयों का गला कांट दो, तो भगवन पशुराम ने तुरंत आपने पिता की इच्छा को पूरा किया। जिससे उनके पिता अपने पुत्र से अधिक प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मागने को कहा तो भगवान परशुराम ने अपनी माता और भाइयों के जीवनदान मांग और खा की उन्हें यह घटना याद न रहा। जिसके बाद ऋषि जमदग्नि ने वापस अपनी पत्नी और चारों पुत्रों को जिन्दा कर दिया।
भगवान परशुराम ने आखिर क्यों 21 बार क्षत्रिय का संहार किया ? आइए जानते है यह रोचक कहानी
जब महिष्मती देश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन जो की सहस्त्रार्जुन के नाम से भी जाने जाते थे, एक दिन एक रास्ते से गुजर रहे है, तो वहां थक कर, ऋषि जमदग्नि के आश्रम के पास आराम करने के लिए स्थान माँगा, तो ऋषि वर ने विश्राम के लिए स्थान का प्रबंध कर दिया और देवराज इंद्र द्वारा मिले कामधेनु गाय की कृपा से राजा सहित पूरी सेना के लिए भोजन आदि की व्यवस्थाकर दी। इस व्यवस्था को देखा कर राजा कार्तवीर्य अर्जुन चकित रह गया और इसका बारे में ऋषि जमदग्नि से पूछा तो ऋषि वर ने बताया की यह एक अनोखी गाय माता कामधेनु की कृपा से हुए है,
तो फिर राजा कार्तवीर्य अर्जुन जब कामधेनु गाय को देखा तो, उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु गाय को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जिसके कारण ऋषि जमदग्नि बहुत ही क्रोधित हुए और यह सारी बात अपने पुत्र परशुराम को बताया, तो भगवन परशुराम अपने पिता के अपमान की बात सुनकर बहुत ही क्रोधित हुए और प्रतिशोध लेने का प्रण लिया। उसके बाद भगवान परशुराम राजा कार्तवीर्य के राज दरबार में पहुच और वही पर अपने परसु वज्र से सहस्रार्जुन के सभी भुजाएँ सहित उसका सर धर से अलग कर दिया, जिसके बाद सहस्रार्जुन के पुत्रो ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए, धोखे से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दिया, जिनके मृत्यु के वियोग में परशुराम की माता रेणुका ने भी खुद को सती कर लिया।
इस घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-"मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा"।उसके बाद उन्होंने ने अहंकारी और नीच हैहयवंशी क्षत्रियों से 21 बार युद्ध किया।
महाभारत काल में भगवान परशुराम का योगदान किस प्रकार था आइए जानते है ?
भगवान परशुराम को अमरत्व प्रदान है इसलिए वे त्रेतायुग के बाद भी द्वापरयुग यानि महाभारत काल में भी उनके होने का जिक्र आप ने सुना होगा। जब गुरु द्रोणाचार्य ने सूतपुत्र होने कारण कर्ण को अस्त्र-शस्त्र विद्या देने से मना कर दिया था तो उसके बाद कर्ण भगवान परशुराम के पास गये, भगवान परशुराम जो की सिर्फ ब्राह्मणों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे, और क्षत्रिय को शिक्षा देने के खिलाफ थे,भगवन परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी कई प्रकार कि अस्त्र विद्या दी थी, और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था लेकिन एक सूत का पुत्र होने के कारण , कर्ण ने छल से परशुराम से विधा ली। जब यह बात भगवन परशुराम को पता चला तब उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह विद्या उसके काम नहीं आयेगी।
इसके अलावा भगवान परशुराम का जीवन वर्णन भगवान गणेश के दंत कथा, राम सीता के स्वयंबर कथा, महाभारत के कई प्रसंगों में जिक्र मिलता है. इसी कारण से इन्हें अमर माना जाता है और पुराणों कथाओ के अनुसार कलयुग में भगवान् कल्कि अवतार नारायण के गुरु के रूप में भगवान परशुराम का जिक्र सुना गया है, जो की कलयुग के अंत तक रहे गए।