* आखिर क्या है,करवा चौथ का महत्व ?
करवा चौथ का व्रत हर साल सुहागन महिलाएं पति की लंबी उम्र,स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। करवा चौथ का त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह व्रत उत्तर-पूर्व भारत में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चन्द्रम की पूजा-अर्चना करने के बाद आपने पति के हाथ से पानी-पी कर व्रत खोलती है। कई जगह कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना के लिए करवा चौथ व्रत रखती हैं यह व्रत सुबह 4 बजे यानि सूर्योदय से पहले से शुरू हो जाता है।
इस बार करवा चौथ का त्योहार 13 अक्टूबर को मनाया जाएगा। करवा चौथ व्रत के दिन चंद्रमा का निकलने का समय रात 8 बजकर 10 मिनट पर है। महिलाओं को इस समय तक निर्जला व्रत रहना होगा। करवा चौथ की पूजा-विधि का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 01 मिनट से 07 बजकर 15 मिनट तक है। करवा चौथ का त्यौहार सरगी परंपरा से साथ शुरू होता है। जो महिलाएं करवा चौथ रखती हैं उनके लिए, सरगी उनकी सास बनाती और सरगी सूर्योदय से पहले खाया जाता हैं। करवा चौथ की शाम के समय चंद्रमा के निकलने से 1 घंटा पहले सम्पूर्ण शिव-परिवार की पूजा-विधि की जाती है।
* करवा चौथ की पूजन विधि क्या है ?
करवा चौथ के दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके पूजा घर की सफाई कर लें। इसके बाद सास द्वारा दी गई सरगी खाकर निर्जला व्रत का संकल्प लें। शाम को पीले रंग की मिट्टी से गौरी कि मूर्ति बना करें और साथ में उनकी गोद में गणेश जी को विराजित कराएं।अब मां गौरी को चौकी पर स्थापित करें और लाल चुनरी ओढ़ा कर उनको शृंगार का सामान अर्पित करें।
धूप, दीप,चन्दन,रोली और सिन्दूर से पूजन थाली सजाएं। चन्द्रमा निकलने से लगभग एक घंटे पहले पूजा शुरू कर दें पूजा के दौरान महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनती हैं और छलनी के द्वारा चंदमा को देखने के बाद अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद महिलाएं पति के हाथ से जल ग्रहण करकें अपना व्रत खोलती हैं और सास से अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद लेती हैं।
* करवा चौथ की कथा
श्री गणेशाय नमः !
पौराणिक कथाओ के अनुसार, एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। एक बार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी दिन को सेठानी सहित उसकी सातों बहुएं और उसकी बेटी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा। रात के समय जब साहूकार के सभी लड़के भोजन करने बैठे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन कर लेने को कहा। इस पर बहन ने कहा- भाई, अभी चांद नहीं निकला है। चांद के निकलने पर उसे अर्घ्य देकर ही मैं भोजन करूंगी।
साहूकार के बेटे अपनी बहन से बहुत प्रेम करते थे, इस लिए उन्हें अपनी बहन का भूख से व्याकुल देख बेहद दुख हुए। साहूकार के बेटे नगर के बाहर चले गए और वहां एक पेड़ पर चढ़ कर अग्नि जला दी। घर वापस आकर उन्होंने अपनी बहन से कहा- देखो बहन, चांद निकल आया है। अब तुम उन्हें अर्घ्य देकर भोजन ग्रहण करो। साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से कहा- देखो, चांद निकल आया है, तुम लोग भी अर्घ्य देकर भोजन कर लो। ननद की बात सुनकर भाभियों ने कहा- बहन अभी चांद नहीं निकला है, तुम्हारे भाई धोखे से अग्नि जलाकर उसके प्रकाश को चांद के रूप में तुम्हें दिखा रहे हैं।
साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों की बात को अनसुनी करते हुए भाइयों द्वारा दिखाए गए चांद को अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार करवा चौथ का व्रत भंग होने के कारण विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश साहूकार की लड़की पर क्रोधित हो गए। उस के बाद लड़की का पति बीमार पड़ गया और घर का सारा धन उसकी बीमारी में लग गया।
साहूकार की बेटी को जब अपने दोषों का पता लगा तो उसे बहुत बुरा लगा। उसने गणेश जी से क्षमा प्रार्थना की और फिर से विधि-विधान पूर्वक चतुर्थी का व्रत शुरू कर दिया।इस प्रकार उस लड़की के श्रद्धा-भक्ति को देखकर भगवान गणेश जी उसे प्रसन्न हो गए और उसके पति को जीवनदान दिया और धन, संपत्ति और वैभव से युक्त कर दिया।