गुरु होते, सबसे महान,
जो देते, सबको ज्ञान
आओ वाल्मीकि जयंती पर करें अपने गुरुओं को प्रणाम
आप सभी को वाल्मीकि जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।
महाकाव्य रामायण युगों-युगों से हिंदू धर्म का एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है। रामायण लिखने का श्रेय महर्षि वाल्मीकि को जाता है, महाकाव्य रामायण पहली बार संस्कृत में लिखा गया था। महर्षि वाल्मीकि का जन्म आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। इस साल 9 अक्टूबर यानि आज वाल्मीकि जयंती मनाई जा रही है।
रामायण सबसे पहले किसने लिखी ?
ये बात भारत के 99% लोग जानते है की रामायण सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखी। आइये जानते है की वाल्मीकि जी आखिर कौन थे ?
महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों में प्रमुख स्थान व दर्जा दिया गया है। वे संस्कृत भाषा के आदि-कवि और सत्य सनातन धर्म (आज कल ये हिन्दू में सिमट गया है ) के आदि-काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र है।
कैसा था महर्षि वाल्मीकी का जीवन चरित्र : -
एक पौराणिक कथा के अनुसार वाल्मीकी जी पहले रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन-पोषण के लिए लोगों को लूटा करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि से मिले, तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया। तब नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि- तुम यह नीच-काम किस के लिए करते हो?, इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया कि अपने परिवार को पालने के लिए। फिर नारद जी ने प्रश्न किया कि तुम जो भी अपराध करते हो और जिस परिवार के पालन-पोषण के लिए तुम इतने अपराध कर रहा हो, क्या वह परिवार तुम्हारे पापों में भागीदार बनने को तैयार होंगे। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्नाकर, नारद को पेड़ से बांधकर अपने घर गए। वहां जाकर उन्होंने अपनी पत्नी, माता-पिता और बाकियों से बारी-बारी से पूछा की, क्या तुम मेरे पाप में भागिदार बनोगे ? वह यह जानकर आश्चर्यित रह गए कि परिवार का कोई भी सदस्य उनके पाप में भागीदार बनने को तैयार नहीं है। वापस लौटकर उन्होंने नारद जी के चरण पकड़ लिए। तब नारद जी ने मुनि से कहा कि- हे रत्नाकर, यदि तुम्हारे परिवार वाले ही इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस तरह नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया और उन्हें राम-नाम के जप का उपदेश भी दिया, परंतु वह 'राम' नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे। तब नारद जी ने विचार करते हुए उनसे मरा-मरा जपने के लिए कहा और मरा रटते-रटते यही 'राम' हो गया और निरंतर जप करते-करते वह ऋषि वाल्मीकि बन गए।
वाल्मीकि आश्रम में रही थीं माता सीता
रामायण के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने देवी सीता का त्याग कर दिया था तब माता सीता कई सालों तक महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही रहीं। यहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने ही लव-कुश को शिक्षा प्रदान की और रामायण जुबानी याद करवाया। यह जानकार आपको आश्चर्य्र होगा की वेदों के अनुसार, रामायण की कहानी सबसे पहले खुद श्री राम जी ने ही सुनी थी। राम पुत्र लव-कुश ने श्रीराम जी के दरबार में गाकर सुनाई थी।
सनातन धर्म ही सत्य है और सत्य ही सनातन धर्म है। जिसका एक उदहारण इस प्रकार है।
विष्णु पुराण में सभी नौ ग्रहो, सूर्य , चंद्र आदि का वर्णन मिलता है, उनकी दूरी को भी योजन में बताई गयी है। और उनका आकर भी बताया गया है, जिसमे बृहस्पति ग्रह को देवताओं के गुरु में सबसे बड़ा बताया गया है।
जब ग्रंथ लिखा गया होगा तब तो उस समय न रॉकेट था न सॅटॅलाइट तो ये सत्य कहाँ से हमारे ऋषियों को प्राप्त हुआ?
इसकी जानकारी आप विष्णुपुराण से जान सकता है। जिसमे समस्त सृष्टि का वर्णन मिलता है।