उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित है। ताजमहल आगरा शहर के यमुना नदी के तट पर बना हुआ है। ताजमहल मुग़लकाल की सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में से एक है। सफ़ेद संगमरमर से बनी, यह स्मारक दुनिया भर में प्रसिद्ध है और यह पर्यटकों का मुख्य केन्द्र बन गया है। ताजमहल विश्व के सात अजूबों में से एक है। ताजमहल का निर्माण एक महान् शासक में अपनी प्रिय पत्नी के प्रेम में करवाया था। ताजमहल का सबसे मनमोहक और अति सुंदर दृश्य पूर्णिमा की रात को दिखाई देती है।
इतिहास
ताजमहल का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने अपनी पत्नी अर्जुमंद बानो बेगम, यानि मुमताज़ महल की याद में बनवाया था। ताजमहल को शाहजहाँ ने मुमताज़ महल के क़ब्र के ऊपर बनवाया है। शाहजहाँ की मृत्यु के बाद उन्हें भी वहीं दफ़नाया गया। मुमताज़ बेगम के नाम पर ही इस मक़बरे का नाम ताजमहल पड़ा। शाहजहां ने 1612 ईसवी में मुमताज महल से निगाह किया। वहीं 1631 ईसवी में मुमताज महल जब अपनी 14वीं संतान को जन्म दे रही थीं, तभी उनकी मोके पर मृत्यु हो गई थी। वहीं शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम की मृत्यु से अंदर से बहुत टूट गए थे, और उसके बाद वह काफी उदास रहने लगे, तब उन्होंने अपने प्रेम को सदा अमर रखने के लिए ”मुमताज का मकबरा” बनाने का निर्णय लिया, जो कि बाद में ताजमहल के नाम से बहुत मशहूर हुआ। इसलिए, इसे शाहजहां और मुमताज के अनोखा प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। ताजमहज मुग़ल के वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। ताजमहल के निर्माण में फ़ारसी, तुर्क, भारतीय तथा इस्लामिक वास्तुकला का सुंदर मिश्रण है। 1983 ई. में ताजमहल को यूनेस्को ने एक विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया। ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया जा चुका है।
ताजमहल की संरचना
42 एकड़ में फैले ताजमहल को बनाने के लिए करीब 20 हजार से अधिक मजदूर लगाए गए थे और 22 वर्षों (1631 - 1653) में ताजमहल पूरी तरह बनकर तैयार हुआ। इसका काम कई चरणों में पूरा किया गया। सिर्फ गुंबद बनाने में ही 15 वर्ष लग गए, बाकी सात वर्षों में काम पूरा किया गया। उस दौरान 1000 हाथियों से काम करवाया गया, जो संगमरमर के पत्थरों को एक स्थान से दूसरी स्थान ले जाने का काम करते थे। ताजमहल के मध्य में चौकोर बग़ीचा है, जिसकी हर भुजा की लम्बाई 305 मीटर है। यह बग़ीचा उत्तर तथा दक्षिण, दोनों तरह छोटे आयातकार से घिरे हुए है। दक्षिणी के परिसर और अंदर जाने के लिए बलुआ पत्थर से बना प्रवेशद्वार है। यहाँ का प्रवेश द्वार 151 फीट लम्बा और 117 फीट चौड़ा है तथा इस प्रवेश द्वार की ऊँचाई भी 100 फीट है। ताजमहल का मुख्य द्वार लाल सेंड स्टोन से बना हुआ है। इसका मुख्य द्वार 30 मीटर ऊँचा है। मुख्य द्वार पर अरबी लिपि में क़ुरान की बातें तराशी गई हैं। इस मुख्य द्वार के ऊपर हिन्दू शैली के गुम्बद के आकार का मंडप बना हुआ है और यह अत्यंत भव्य प्रतीत होता है। यहाँ पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भवन हैं, जैसे मक़बरा, जिसके पश्चिमी और पूर्वी दिशा में एक जैसे दो भवन, और मस्जिद हैं। संपूर्ण परिसर महल की योजना और निर्माण समग्रता के साथ किया गया, क्योंकि मुग़लकालीन में भवन-निर्माण कार्यों के बाद, किसी तरह का जोड़-तोड़ का रिवाज नहीं था।
निर्माण
ताजमहल का निर्माण साल 1632 के आसपास शुरू किया गया था। भारत, फ़ारस, मध्य एशिया और अन्य मुल्कों के वास्तु कलाकारों की एक परिषद में इस इमारत के निर्माण की एक योजना को तैयार किया गया। लगभग साल 1653 तक ताजमहल का काम पूरा हुआ। 20 हज़ार से भी अधिक मजदूर और कारीगर प्रतिदिन ताजमहल के निर्माण में जुटे रहे। ताजमहल के आसपास की दीवार तथा मुख्य द्वार 1649 में बनकर तैयार हुआ। संपूर्ण ताज परिसर के निर्माण में 22 साल का समय लगा और चार करोड़ रुपये ख़र्च हुए। भारत के अलावा फ़ारस और तुर्की के मज़दूर भी शामिल थे। ताजमहल की अपनी एक अलग सौंदर्य है जो पर्यटकों को अपनी ओर खीँच लाती है। शाहजहाँ ने इसे बनाने वालों मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे। इस स्मारक का नक़्शा भारतीय वास्तुकार उस्ताद ईसा ने बनाया था। कुछ लोगों का अनुमान है कि यह नक़्शा बनाने में इटली तथा फ्रांस के वास्तुकार की मदद ली गई थी।
ताज की आंतरिक सज्जा
ताजमहल के अंदर के हिस्से में एक विशाल केन्द्रीय कक्ष, इसके नीचे एक तत्काल तहख़ाना है और उसके नीचे शाही परिवारों के सदस्यों की क़ब्रों के लिए आठ कोनों वाले चार कक्ष हैं। इस कक्ष के बीच में शाहजहाँ और मुमताज़ महल की कब्रें हैं। शाहजहाँ की कब्र बांईं तरफ और बेग़म मुमताज की क़ब्र से कुछ ऊँचाई पर है जो गुम्बद के ठीक नीचे स्थित है। जिस पर पहले क़ीमती पत्थर लगे हुए थे। बग़ीचे की सतह से नीचे एक तहख़ाने में वास्तविक ताबूत मौजूद हैं। मुमताज़ महल की कब्र पर पर्शियन में कुरान की बातें लिखी हैं। इस क़ब्र पर एक पत्थर लगा हुआ है जिस पर लिखा है- मरकद मुनव्वर अर्जुमद बानो बेगम मुखातिब बह मुमताज़ महल तनीफियात फर्र सानह 1404 हिजरी। वहीं शाहजहाँ के कब्र पर पर्शियन में लिखा है - मरकद मुहताहर आली हजरत फ़िरदौस आशियानी साहिब- कुरान सानी शाहजहाँ बादशाह तब सुराह सानह 1076 हिजरी। इस क़ब्र के ऊपर एक लैम्प लगा हुआ है, जिसकी रोशनी कभी समाप्त नहीं होती है। कब्रों के चारों ओर संगमरमर की जालियाँ बनी हुई है। दोनों कब्रें अर्ध कीमती रत्नों से सजाई गई हैं।